यह पूर्णतः हमारी मनोवर्त्ति है, की जिसमें सुविधा वो अच्छा अन्यथा अंगूर खट्टे, तो प्रस्तुत श्लोक यही बताता है कि किसी को भी मानसिकता वो अच्छा वो खराब में ना बांधे, ये आप स्वयम हैं।
न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:।
व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।
na kaścita kasyacita mitraṃ na kaścita kasyacita ripu:|
vyavahāreṇa jāyante, mitrāṇi ripvastathā||
न कोई किसी का मित्र होता है, न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते है।
नोट: प्रत्येक परिस्थितियों को बुद्धि कौशल से निपटा जा सकता है, रुकने का नहीं यही भावना प्रबल करना हमारे जानकरो का प्रयास होता है, अपने स्व अनुभूत अनुभव के द्वारा। जिसे लेखक और एडिटर भाषा, प्रसंग और रोचकता हेतु सरल,पठनीय बनाते हैं, संक्षिप्त करते हैं। अतः प्रस्तुत सुझाव के प्रयोग पूर्व किसी कुशल सिद्ध व्यक्ति के परामर्श या उचित होगा की नीचे कमेंट बॉक्स से अवश्य पूछ लें। सम्पर्क 9807473188
*🙏सुदिनम सुप्रभातम🙏*
*29 मई 2022*
_भृगु वासरे ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी_
लोकाः समस्ता सुखिनः भवन्तु
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