होता था, इस तरह का जानवरो की तरह सलूक और इसी स्वतंत्रता के इस जन्मसिद्ध अधिकार के खातिर कितने लोग बलिदान हुए? अंग्रेजों से मुक्ति पाकर आज बतौर भारत विश्व के साथ अपनी अलग उचाइयां लिख रहे है।
मिल गई आजादी सही है, पर प्रकृति के हर चीज जंगल, पेड़, तलाब, झरने, समुद्र, पहाड़,हरे भरे मैदान सब पर हम सभी प्राणियों का बराबर का अधिकार था, और सबसे आखरी में पैदा हुआ इंसान तो इसकी रक्षा करने के जिम्मे था जिसके एवज में अपनी खुद की जरूरतें पूरी करने भर के बयाने पट्टे पर कुदरत से कुछ ले सकता था। पर कब ये पहरेदार से सरदार हो चले?
मूल ज्ञान quora नाहक़ google किये पड़े हैं।
पूरी धरती जो खुली प्रॉपर्टी थी जाने किससे खरीदी और किसे बेची। अभी के समय ये बीमारी फितरत बनकर हर आदमी का चरित्र बनी है। हवस का अंधा इंसान जो पाए उसपर हाथ रखे सब मेरा के वायरल संक्रमण से ग्रसित।
अरे एक तालाब पर सभी का बराबर का हक है। क्या मछली, क्या कछुआ, क्या सांप, क्या बन्दर, क्या गाय, क्या कुत्ता, क्या हाथी, क्या तोता, क्या बगुला सभी का हक।
ले कहाँ जाएगा, मंगल पर बस्ती बना ली तो भी धरती से मंगल ले जाएगा, पर तु तो जाएगा एक दिन फिर जो आज तेरा है कल किसी और का होगा।सब यहीं रह जायेगा, बस साथ तेरे तेरा कर्म जाएगा। सद कर्म निपटा ले प्राणी यही युगों तक नाम अमर करेगा। वैभव-कीर्ति-यश-धन-दौलत सब निराधार हैं।
पर ये इंसान वहीं कर रहा जिसकी समझ देकर इसे धरती पर भेजा गया, अरे समझ लो कुछ स्थायी नहीं है। कल जहां भारत था आज वहां अमेरिका है, कल जहां मोहन जोदाड़ो था आज बिया बान है, कल जो कैलास भारत का हिस्सा था वो आज चीन में आता है।
सब चलायमान है, सब नश्वर। स्थाई है नाश ये होना है, पर खरीद बेंच की लत, धन सम्पत्ति जानी कुछ नही, पर कब्जा किये बैठे है।