कहानी उस हिम्मत की, जो कभी "साइकिल चाची" कभी "किसान चाची", कभी "अचार चाची" के नाम से चिढाई गई, पर खुद को साबित करने का जज्बा इतना बुलन्द की अशिक्षा, पति द्वार छोड़ना ये पहाड़ तक ना रोक इनके प्रचंड वेग को और आज उन्ही टर्राते मेढ़को के सामने "पद्मश्री" विभूषित "राजकुमारी" देवी है, और वो सुसुप्तावस्था में।
पदम "राजकुमारी देवी" परिचय की मुहताज नहीं
शादी 15 साल की उम्र में कर दी गई थी। पति एक किसान था, किसान क्या केवल तम्बाकू उगाना आता था। परिवार का खर्च ठीक से नहीं चल रहा था। साथ ही शादी के नौ साल बाद भी राजकुमारी देवी की गोद सूनी थी। यहां तक कि इन्हें घर से निकाला दिया गया।
जिंदगी को खूबसूरत खुद बनाया जाता है।
कहीं ना कहीं नितांत तिरस्कार की भावना ने दर्द पहुँचाया, पर मुजफ्फरपुर के सरैया की रहनेवाली राजकुमारी देवी जो आज 65 साल की उम्र पार कर चुकी ने हिम्मत की वो मिसाल बनाई इसी गुस्से-दर्द को पाल कर इतिहास लिख मारा।
अत्याचार और अनहोनियों का विकास क्रम।
लिख तो दिया शब्दों को बोल्ड करके पर पदम श्री राजकुमारी देवी ने जो झेला वो दुर्गति की पराकाष्ठा रही, जिसे बयान करते हुए वो ये भी कहती है कि भक्त प्रह्लाद के आगे यह परीक्षा कुछ नहीं रही।
सकारत्मकता, आस्था से आती है, ये बीज मंत्र है। इसी एक मन्त्र को मानते हुए 1990 किसी प्रकार दुख झेलते हुए इन्होंने खुद खेती की। लोकल बिचौलिये से तो लागत मूल्य भी निकलना मुश्किल हुआ, तो रुख मंडी की ओर किया, वहां भी कम मशक्क़त नहीं थी, तो रिक्शा पकड़ शहर की गलीयों में फेरी लगाए।
लोगो की जरूरत पर खरे उतरो
फिरी चल रही थी और अभी तक के भाव सही मिल रहे थे। एक ग्राहक ने गांव वाला जान पूछ लिया निम्बू होता है तुम्हारे यहां, चाची बोली "हैं", ग्राहक भी बोली "आओगी 7-8 दिन में लेती आना 15 किलो, अचार के लिए"। चाची अगली सुबह नीबूं ले पहुंची उसके बाद उसका जो पैसा मिला वो दूध की मलाई साबित हुआ।
चाची उत्साहित थी की 50 किलो नीबू गांव भर में मिल जाएंगे तो 25 किलो ले फिर निकल पड़ी पर कोई ग्राहक ना मिला दिनभर, तो मंडी में बेचने गई, शाम हो रही थी पर कल बेचे गए दाम से आधे दाम भी नहीं मिल रहे थे मंडी में।
सुनना बड़ा जरूरी है
तो चाची उलझ पड़ी मंडी में, मंडी वाला जो बोला उसे ध्यान से पढ़ना "ये मंडी है, गांव से फ्री में लाई है ना!" "पर लाने कितना खर्चा लगा है , दाम कम है" चाची बोली "देख हमने तो दाम लगा दिया है, दिनभर की धूप खाया है कल तक आचार भी ना बनेगा इसका"
ताव काम का हो दिमाग में नहीं
अब चाची नीबू साथ ले गांव वापसी कर रही थी। 13 रुपये का फर्क के साथ अचार और मुरब्बे बनाये। पर ये डिब्बे कोई दुकानदार बेचने को तैयार नहीं हुआ तो राजकुमारी चाची ने साइकिल चलानी सीख और खुद के दम से बेचने चल पड़ी पर 3 रु का प्रॉफिट मिला।
गुड़ से महंगी बिकती है मिठाई
दरअसल प्रोडक्ट का स्वाद खाँटी देसी था मार्किट में कड़ी टक्कर थी। अचार को और अच्छे ढंग से तैयार करना पड़ेगा तो ही बेहतर दाम मिल सकता है। ये सोच इन्हें पूसा कृषि विश्वविद्यालय ले पहुँची। यहां ना सिर्फ फ़ूड प्रोसेसिंग का फूड प्रोसेसिंग और खेती की भी विधिवत ट्रेनिंग ली।
अब अचार-मुरब्बे आदि से अच्छी इनकम होने लगी और इसके साथ राजकुमारी देवी अपने मदद और दूसरों को भी प्रशिक्षण देनी लगी, जो खुद प्रोडक्ट बना तो लेती थी पर मार्केटिंग यही कर रहीं थी को अपने साथ मिला लिया और आगे बढ़ती हुई सफलता के कीर्तिमान गढ़े।
जब मढ़ जाए तो खूब बजे है, डंका।
तो शुरू हुआ इनका भी मान सम्मान। वर्ष 2003 के सरैया मेले में लालू यादव जी द्वारा। फिर साल 2007 नीतीश कुमार जी ने 'किसानश्री' पुरुस्कार से नवाजा किया। गौर तलब की इस तरह का कृषि पुरुस्कार जहां दबदबा पुरुष वर्ग का रहता है। उस वर्ष ये पुरुस्कार किसी महिला को मिला था। इस तरह लोग उनको 'किसान चाची' कहने लगे।
उनके काम से प्रभावित होकर अमिताभ बच्चन करोडोतु के शो में राजकुमारी जी को बुला सम्मानित भी कर चुके हैं।