#उपनयनमें_सावित्रिउपदेशक_आचार्य_तथा#विवाहमें_कन्यादाताको_उपवास_करना_चाहिये#भुक्तायैव_सुतामुपोषितनरो_दद्याच्च_सावित्रिका #मारब्धोत्सवके_यदा_जनिमृति_स्यातां_स्वगोत्रे_क्वचित् | #साङ्गं_तं_विदधित_वाजमपरेऽस्मादारभेत्पूर्वतो #यज्ञोद्वाहन_चौल_मौञ्जिकमहः_सुस्वर्गदिक्_त्रित्रिषु ||मर्हूतमार्तण्ड ४/४३|| कन्यादानकर्ता स्वयं उपवासी रहकर भोजन किये हुए वर को (भोजन की हुई)कन्या दैं और आचार्य स्वयं उपवास पर रहकर भोजन(दूध-भात या खीर =ब्रह्मौदन) किये हुए बटु को उपनयन में सावित्रि(गायत्रीमंत्र का उपदेश) दैं | बिना भोजन किये वर पत्नीग्रहण और बटु सावित्री ग्रहण न करैं | उत्सव के प्रारम्भ हो जाने पर यदि अपने गोत्र में कहीं जन्म या मरण हो जाय तो वहाँ उस कर्म को साङ्गोपाङ्ग पूरा करना ही चाहिये | परन्तु उसमें हवनादि कर्मका अन्न आदि अन्य असगोत्रको करना चाहिये | ऐसा करनेपर अशौच का दोष नहीं लगता | अब उत्सव का आरम्भ कब होता हैं?---> #एकविंशतिहर्यज्ञे_विवाहे_दशवासराः | #त्रिं_षट्_चौलोपनयने_नान्दीश्राद्धं_विधियते || #नान्दीश्राद्धं_विवाहादौ_श्राद्धे_पाकपरिक्रिया | #आरम्भो_वरणं_यज्ञे_सङ्कल्पो_व्रतसत्रयोः ||#आरंभे_सूतकं_नास्ति_अनारंभे_तु_सूतकम् ||इति निर्णय- कर्म के प्रधान नियत दिन से यज्ञ में २१ दिन पहले, विवाह में १० दिन पहले, चूडाकरण में ३ दिन पहले और उपनयन में ६ दिन पहले उस उत्सव का आरम्भ हो जाता हैं | यज्ञ में ऋत्विक् आदि का वरण करना,बडे सत्रों में ---भागवत आदि पुराणों के सत्रों आदि में प्रधानसंकल्प करने से, विवाह आदि संस्कारों में नान्दीश्राद्ध और श्राद्ध में पाकारम्भ यह उस कार्य का आरम्भ कहा है | कार्य के आरम्भ हो जाने के बाद अशौच नहीं लगता, जहाँतक कार्य का आरम्भ न हो तबतक में कोई अशौच आदि आ जाये तो अशौच लगता हैं |ॐस्वस्ति || पु ह शास्त्री.उमरेठ ||
