यह टिप्पणी अक्सर गुरु जी करते रहते की राहु एक रहस्यमय ग्रह?
"जी गुरु जी" अच्छे शिष्य की तौर पर हाँ में हाँ मिलाई।
जब तक संग रहा "जी गुरु जी" कहता रहा।
गुरु संगत पूर्ण होने के बाद एक शिष्य का परम उद्देश्य गुरुवाणी को जन जन तक पहुचने का होता है, व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया ने ज्योतिष, लोगों के शंका समाधान आदि उत्सुकता का निश्चित ही बड़े सुरक्षित तरीके से समाधान किया है।
समझिए कैसे? राहु एक रहस्यमय ग्रह?
वक्री राहु है क्या?
राहु दर्पण है और दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। यानी सामने वाला जैसा है वो वैसा है।
राहु बुद्धि है जिसके साथ उसका कल्याण और जिसके सर पर सवार उसे नचा मरे।
राहु अतृप्त है , इसीलिए ऐसे वक्री राहु वाले जातक की इच्छाएं कभी भी पूरी नहीं होती है वह हमेशा और और की रटन लगाता जाता है कैसे भी, किसी से और कोई भी साधन अपनाएं।
राहु कलियुग है।
वक्री राहु जिसके सर पर बैठता है, प्रथम उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। कहूँ क्या, सही गलत में उलझा ऐसे निर्णय आगे करता है जो उन्मादी हो, सही निर्णय भी इनकी भाव भंगिमा से ही ना बुझने वाली आग साबित होते हैं।
परिवारिक क्लेश, बाप बेटे को दुश्मन, बेटा भाई को बैरी, भाई मां को पक्षपाती समझे, मां शांत बहु पर भड़के और सिर्फ अपना लाभ देखे है राहु को।
राहु अगर शुक्र के साथ तो मजनू, फरहाद बने आसपास से कोई मतलब नही और गाता है ये दुनिया ये महिफिल...उसे तो बस एक झलक उसकी प्रेमिका की मिले। पैसा पैसा करता भी मिले है भटकता है।
दरअसल राहु नशा है, शुक्र के साथ मिलता है तो कुछ को पैसा और सत्ता दोनों देता है।
राहु का गुरु प्रेम जग प्रसिद्ध है, इसलिए राहु बुद्विमान होता है। आज्ञाकारण भी तो गुरु भी ऐसे शिष्य पर वारी वारी, जात दानव की तो विनम्रता कहाँ, जरा सा ज्ञान मिलते ही उड़ने लगता है, गुरु शुक्र तो फिर भी चल जाये।
राहु ब्रह्स्पति गुरु के साथ मिलता है तो दोनो में से एक एक्टिव होगा यह चांडाल योग है, ज्ञान मिलने से पहले गुरु बोले है उसके बाद राहु उसे ले उड़ चले है, गुरु के टोकने पर गुरु की इज्जत नहीं करता उसी का ज्ञान अपने लिए प्रयोग करता है और अपना बताता है।
गुरु घण्टाल बाबा भी राहु ही हैं, बनावटी, दिखावटी पन जिन गुरुओं में मिलेगा। इनकी पहचान धर्म के विपरीत काम करने की, मेरी पूजा करो। और अपने आप को धार्मिक दिखाएंगे।
कलियुग का धन है ड्रग्स है जिसपर राहु वास।
इतना अधर्म कलियुग में तो तो सन्त जनों का वास, कैसे सुनिश्चित होता है तो मायाधर की बड़ी मनोहर व्यवस्था जिसमें कलियुग का रॉक स्टार शनिदेव है।
जिससे इंफ्लून्स, आकर्षित रहते है दोनो राजा कलि और राहु ।
शक्लो-सूरत की समानता इन्हें खिंचती होगी, पर शनि देव जज है, न्यायाधीश।
व्यवस्था बड़ी सुंदर समझे माया की रची कलि के प्रभाव से - जातक राहु ग्रसित, जातक दिनचार्य का नियमित (यही धार्मिकता है) तो खाता लिखा, अनियमित तो राहु वक्री| मचा उधम पर बुद्ध बिलेस बिगाड़ शनि पेट्रोल है शनि दुख है। शनि पश्चिम दिशा है, और राहु पश्चिम दक्षिण दिशा है।
राहु में मंगल की तरह पराक्रम है जो दानों का सेनापति है शनि की तरह भी है रूप रंग में और दुख का कारण भी है क्योंकि तामस हमेशा दुख को ही दावत देता है।
लेकिन पश्चिम जगत में समृद्धि का कारक भी यही है। वहां धर्म बिल्कुल नहीं है।
गल्फ कंट्री जहां सूखा पड़ता है वहां पेट्रोल और अफीम की खेती होती है लेकिन पीने के लिए पानी नहीं होता।
कलयुग में राहु का ही असर माना जाता है इसीलिए पूजा से पहले देवताओं को और अपने माथे पर भी चंदन लगाया जाता है जिससे राहु शांत रहे।
क्योंकि विचार रूपी सर्प अच्छी बुरी तरसना हमारे सिर पर सवार रहती है जिसे चंदन ही से शांत किया जा सकता है।
जो अनुभव करें ओरिजिनल ही पोस्ट करें देखें कितना आनंद आता है।
*पं.जितेंद्र प्रसाद शुक्ला-*
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