मस्तक तिलक लगाया क्यूं जाता हैं?
हिंदुओं में पूजा-यज्ञ, शादी, जन्मदिन, भाईदूज, यात्रा जाते समय लम्बा तिलक, चावल के दाने भी लगाते हैं। बाबा, साधु सन्यासी पूरे माथे को भरकर लगाते हैं।
अलग अलग तरह का तिलक लगाने वाले ये बाबा अपने-अपने संप्रदाय के हिसाब से मस्तक पर तिलक अथवा मुद्रा लगातें है। जैसे विष्णु भक्त माथे पर खडा तिलक, और शिव भक्त आडी रेखाएं अर्थात ‘त्रिपुंड्र’ लगाते हैं ।
1. क्यों लगाते है तिलक
1. सशरीर प्रभु की आराधना या ध्यान ही तिलक का प्रथम उद्देश्य है :
- धर्म का उद्देश्य मानव विकास के सद्गुणों को बनाये रखना है जिस ज्ञान आज मनुष्य अपने बलशाली शेर, हाथी आदि से सर्वश्रेष्ठ हो पूरी धरती पर आधिपत्य स्थापित किया, तो उन आदतों को धर्ममार्गी हो नित्यकर्म द्वारा आदतों में ढाल कर अपनी और समाज में उपयोगी बनें।
यह भावना स्वयम को समर्पित कर ‘अपने शरीर को ईश्वर का घर या मंदिर मानना है'
कौन कहाँ हैं शरीर रूपी मंदिर में?
• चोटी वाला स्थान टेक्निकली सहस्रार-चक्र मूर्धास्थान पर होता है । वहां निर्गुण परमेश्वर का वास होता है ।
दोनों भौंहों के मध्य को आज्ञा-चक्र यहीं पर साकार या सगुण परमेश्वर का वास होता है । ग्रहस्थ सामान्य मनुष्य इसी सगुण परमेश्वर की ही पूजा करना उचित है ।
आ. आज्ञाचक्र पर लगा तिलक दिनभर की सक्रियता बढाता है:
दरअसल तिलक लगाना शार्ट कट पूजा ही है ।
नित्य कर्म पद्धति बताती है कि मध्यमा या मिडिल फिंगर जिसका डायरेक्ट कनेक्शन हृदय से होता है का प्रयोग कर तिलक धारण किया जाता है ।
अब इस हार्ट कनेक्टेड मध्यमा से भौंहों के बीच स्थित परमेश्वर को तिलक लगाते समय थर्ड ऑय से बीट निकलती हैं ।
जो मिडिल फिंगर के रास्ते हृदय के साथ सिंक हो जाती हैं।
नोट: तिलक लगाने का यह तरीका पुरुषों के संदर्भ में है ।
स्त्रियां खुद अनामिका उंगली से कुमकुम लगाएं ।
२. खड़ी लाइनों का तिलक
मस्तक पर निकाली गई तीन आडी रेखाओं को ‘त्रिपुंड्र’ कहते हैं । त्रिपुंड्र मुद्राएं भस्म की होती हैं ।
तिलक मुद्रा (तिलक) चंदन की बनाते हैं ।

