आपको आश्चर्य होगा भोजन का नियम भजन , नमाज, अरदास का करने के लिए है ताकि अपने काम को व्यवस्थिति करने की कला सिख जाए जिसे आजकल कौशल भी कहने लगे और हमारे जीवन, भौतिक-सांसारिक निर्वहन पैसा-कौड़ी जेब में भरे।
एक गौरतलब बात की ये वो नियम हैं जो भारत के लिए, भारत में रहने वालों पर लगते है।
पश्चमी, खाड़ी देशों के खाने पीने के नियम फर्क, होंगे तो वहां रहते हो ये नियम आपके लिए नही है। और ना ही उनके नियम फॉलो करें, निवेदन है।
भारत एक अलग जलवायु का देश है, यहां के नियम आपको यहां का पुराना रहने वाला ही बताएगा, अब ये सब संस्कृत में लिखा था। पर इसे धर्म से ना जोड़े कभी नहीं क्योंकि ये आदि सभ्यता को मानने वाले है, किसी धर्म मत के लम्बरदार नहीं है।
हिन्दू धर्म प्रकृति के साथ उसके हिसाब से रहने की कला। मस्लिम, ईसाई आदि व्यक्तियों संसारिक और भौतिक सुख को पाने की कला है। बस यही है, और एक बात की जब यहां रहे तो यहां के अनुकूल व्यवहार रखें उम्र और स्वास्थ्य बढ़ा रहेगा।
१. आहार कैसा न हो और कैसा हो ?
भारत उष्ण मानसूनी जलवायु, यानी tropical monsoon वाला देश है । अन्यथा ना ले तो यहां गर्मी बढ़ाने वाले
मांसाहारी तथा तमोगुणी आहार का सेवन न करें ! अधिक तले एवं मसालेदार पदार्थ, बासे पदार्थ तथा पोषक-मूल्य रहित एवं पचने में भारी पिज्जा, चिप्स, वेफर्स जैसे ‘फास्टफूड’ का सेवन न करें ।
शाकाहार एवं सात्त्विक आहार का सेवन करें ! जो शरीर में ठंडक बढ़ाये दूध, मक्खन, गाय का घी, छाछ, चावल, गेहूं, दालें, साग, फल जैसे अथवा इन से बने सात्त्विक अन्नपदार्थों का सेवन करें ।
चार मौसम का क्षेत्र होने के कारण, भोजन करते समय पेट के दो भाग अन्न सेवन करें । तृतीय भाग जल हेतु एवं चतुर्थ भाग वायु हेतु रिक्त रखें । यही पाचन तंत्र स्वस्थ रखने हेतु मिताहार है !
२. भारत में भोजन अल्थी पलथी मार कर और दक्षिण दिशा में करने का तरीका क्यों?
हमारा शरीर शांत, टेंशन फ्री कब होता है, इसकी जानकारी के लिए अपन के पास कुछ मुद्राये है , विष्णु मुद्रा-शिव मुद्रा-हनुमान मुद्रा। वैसे तो धर्म ग्रन्थों में लिखा है अल्थी पलथी मारकर भोजन के लिए। हम बस सत्यापित कर रहे है।
तो लेट कर विष्णु मुद्रा से भोजन सांस की नली में फसनें की आशंका, बैढ कर शिव मुद्रा लटके पैर से शरीर पूर्णतः रिलैक्स मोड में नहीं रहता है। तो अल्थी पलथी मार हनुमानजी की दोनो हाथ खँजड़ी ले भक्ति विभोर रहने वाली मुद्रा। उचित और सहज है।
अतः अल्थी पलथी मार जमीन पर आसन अथवा आसन लेकर उस पर भोजन हेतु बैठें । शंकर जी वाली आसंदी -पटल (‘टेबल- कुर्सी’) पर अथवा केवल भूमि पर भोजन हेतु न बैठें ।
यथासंभव परिवार के सभी सदस्य रसोईघर अथवा भोजनकक्ष में एकसाथ भोजन करें, बनाने वाला भी फ्री हो अन्य कार्य को ओर बढ़े।
प्राचीन समय और कहीं कहीं आज भी दिन में और खुले में खाना खाते है, सूरज पूरब से उगता है खाने में बाल कीड़ा, या कुछ ना खाने वाली वस्तु प्रकाश में अच्छी तरह से दिखेगी।
दक्षिण दिशा में खाएंगे तो परछाई पड़ेगी, आज स्थिति अलग है तो कमरे में जिधर रोशनी हो उस तरफ मुँह कर खाएं, प्रयास भी करे वो दिशा दक्षिण ना हो।
भगवान को भोजन का भोग क्यों।
बनाने वाला अदृश्य शक्ति के डर से भोजन साफ और स्वछ बनाएं।
सर्वप्रथम परोसी हुई थाली (भोजन) ईश्वर को अर्पित करें, तत्पश्चात ईश्वर का प्रसाद समझ कर नामजप करते हुए उसे ग्रहण करें ।
किसी का भी झूठा अन्न न खाएं क्यों?
क्योंकि किसी मुह से इन्फेक्टेड बैक्टीरिया, वायरस आपके शरीर को बीमार ना कर पावें। धार्मिक कारण इससे अनिष्ट शक्तियों की पीडा हो सकती है ।
थाली में अन्नपदार्थ शेष न रखें ?
परोसा भात बड़ी मेहनत से अंकुरित हो, मुसम की मार से बचकर, सड़न से बचकर, किस सतह से किस स्थान तक आपके तक आया है, दूर से आये मेहमान का स्वागत और सत्कार करते है ना।
भोजन के उपरांत थाली के आसपास पडे अन्नकण पैरों में न आएं; इसलिए उन्हें तत्काल उठाएं ।
‘अन्नदाता सुखी भव ।’ समुचित सम्मान देकर उठे।
३. भोजन के उपरांत वाम अंग पर लेटना
दोपहर के भोजन के उपरांत २४ मिनट बार्इं करवट लेफ्ट लेटना, अर्थात वाम अंग पर झपकी लेना ।
अध्यात्मशास्त्र : भोजन के उपरांत अन्नपचन ठीक से हो, इस हेतु आंतों की ओर रक्त की अधिक आपूर्ति होती है । ऐसे में मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति अल्प मात्रा में होने से मस्तिष्क के कार्य में थोडी शिथिलता आती है । इसलिए इस काल में बिलकुल थोडे ही समय के लिए विश्राम करना लाभदायक होता है ।
