*🌷शुभोदयम्🌷*
हिन्दू जीवन पद्धति ने इस संसार को हमेशा से ही ज्ञान और जीवन के कठिन रास्तो को सुगम और सरल बनाया है। मनुष्यता ना तो असुरो-राक्षसों-दानवों की तरह बलशाली और ना ही देवताओं की भांति दिव्य शक्तियों युक्त रहें, किन्तु जितना प्रकृति और रचियता मनुष्य पर अनुकम्पा रखता है शायद ही किसी अन्य उसकी रचना से उसका लगाव हो क्योंकि मनुष्यता में प्रेम-आपसी लगाव रहा, और इसे पक्के तौर से नियमित करने के लिए हमारे ऋषि-मुनि-सन्त आदि ने हमे श्लोकों के माघ्यम से अनुपम निधि कृति की। पं० श्री जितेंद्र प्रसाद शुक्ल इन्ही श्लोकों के अर्थ हमारे सामने प्रकाशित कर रहें है।
विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्यः साधोःविपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
vidyā vivādāya dhanaṃ madāya, śaktiḥ pareṣāṃ paripīḍanāya|
khalasyaḥ sādhoḥviparītametad jñānāya dānāya ca rakṣaṇāya||
अर्थ:
चालाक हमेशा:-
० अपना ज्ञान झूठी दलीलों तर्कों में,
० अपना धन अपने पेट-उपभोग-दिखावे के लिये,
० प्राप्त सत्ता को दूसरों के समाने दिखाने में भले ही समाने वाले को कष्ट ही क्यों न हो में उपयोग करता है।
वहीं सज्जन पुरुष मनुष्यता की उच्चता को:-
० अपनी विद्या को मानव विकास, अच्छे कर्मों के लिये इसके बदले वह व्यापार नही बल्कि प्राप्त ज्ञान को खुले रूप से बांटने के लिए आतुर रहता है
० अपना धन बपौती ना समझ बल्कि दूसरों की सहायता सहयोग से कमाया मानते हुए कुछ भाग पुनः समाज को देने हेतु तटपर रहता रहता दान के माध्यम से,
० प्राप्त सत्ता, ताकत है तो कमजोर के रक्षणार्थ प्रयोग करता है।
*🙏सुदिनम सुप्रभातम🙏*
*28 मई 2022*
_गुरुवासरे ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्र्योद्शी_
लोकाः समस्ता सुखिनः भवन्तु
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